कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू
चौपाई २, दोहा ५४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥ नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी॥ २ ॥
अर्थ
हृदय का विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंह की गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रों में जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। माजहि खाइ मीन जनु मापी॥
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।
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राम-कौसल्या संवाद