पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा

चौपाई ३, दोहा ५९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥ जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ॥ ३ ॥

अर्थ

सीताने पलंग की पीठ, गोद और हिंडोले को छोड़कर कठोर पृथ्वी पर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा संजीवनी जड़ी के समान [सावधानी से] इनकी रखवाली करती रही हूँ। कभी दीपक की बत्ती हटाने को भी नहीं कहती।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।

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राम-कौसल्या संवाद