जेहि चाहत नर नारि सब अति
जेहि चाहत नर नारि सब अति
दोहा ५२ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति। जिमिचातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति॥ ५२ ॥
अर्थ
तथा जिस (लग्न) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यन्त व्याकुलता से इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्यासे चातक और चातकी शरद ऋतु के स्वाति नक्षत्र की वर्षा को चाहते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का दोहा ५२ है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।
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राम-कौसल्या संवाद