धरम सनेह उभयँ मति घेरी

चौपाई २, दोहा ५५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥ राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥ २ ॥

अर्थ

धर्म और स्नेह दोनों ने कौसल्याजी की बुद्धि को घेर लिया। उनकी दशा साँप-छछूँदर की-सी हो गयी। वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध (हठ) करके पुत्र को रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयों में विरोध होता है;

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।

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राम-कौसल्या संवाद