मातु बचन सुनि अति अनुकूला
मातु बचन सुनि अति अनुकूला
चौपाई २, दोहा ५३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला॥ सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवँरु न भूला॥ २ ॥
अर्थ
माता के अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर--जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्ष के फूल थे, जो सुखरूपी मकरंद (पुष्परस) से भरे थे और श्री (राजलक्ष्मी) के मूल थे--ऐसे वचनरूपी फूलों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का मनरूपी भौंरा उन पर नहीं भूला।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।
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राम-कौसल्या संवाद