निज जड़ता लोगन्ह पर डारी

चौपाई ४, दोहा २५८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥ अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सय सम जाहीं॥ ४ ॥

अर्थ

तुम अपनी जड़ता लोगों पर डालकर, श्रीरघुनाथजी [के सुकुमार शरीर] को देखकर [उतने ही] हलके हो जाओ। इस प्रकार सीताजी के मन में बड़ा ही सन्ताप हो रहा है। निमेष का एक लव (अंश) भी सौ युगों के समान बीत रहा है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।

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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध