गननायक बरदायक देवा
गननायक बरदायक देवा
चौपाई ४, दोहा २५७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥ बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥ ४ ॥
अर्थ
हे गणों के नायक, वर देने वाले देवता गणेशजी! मैंने आज ही के लिये तुम्हारी सेवा की थी। बार-बार मेरी विनती सुनकर धनुष का भारीपन बहुत ही कम कर दीजिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध