नृपन्ह केरि आसा निसि नासी
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी
चौपाई १, दोहा २५५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी॥ मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥ १ ॥
अर्थ
राजाओं की आशारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। उनके वचनरूपी तारों के समूह का चमकना बंद हो गया (वे मौन हो गये)। अभिमानी राजारूपी कुमुद संकुचित हो गये और कपटी राजारूपी उल्लू छिप गये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध