मनहीं मन मनाव अकुलानी

चौपाई ३, दोहा २५७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥ करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई॥ ३ ॥

अर्थ

वे व्याकुल होकर मन-ही-मन मना रही हैं—हे महेश-भवानी! मुझ पर प्रसन्न होइये, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिये और मुझ पर स्नेह करके धनुष के भारीपन को हर लीजिये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।

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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध