भूप सयानप सकल सिरानी
भूप सयानप सकल सिरानी
चौपाई ३, दोहा २५६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी॥ बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी॥ ३ ॥
अर्थ
राजा का भी सारा सयानापन समाप्त हो गया। हे सखी! विधाता की गति कुछ जानने में नहीं आती। तब एक चतुर सखी कोमल वाणी से बोली—हे रानी! तेजवान् को [देखने में छोटा होने पर भी] छोटा नहीं गिनना चाहिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध