सखि सब कौतुकु देखनिहारे
सखि सब कौतुकु देखनिहारे
चौपाई १, दोहा २५६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सखि सब कौतुकु देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे॥ कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥ १ ॥
अर्थ
हे सखी! ये जो हमारे हितू कहलाते हैं, वे भी सब तमाशा देखनेवाले हैं। कोई भी इन्हें गुरु विश्वामित्रजी को समझाकर नहीं कहता कि ये (रामजी) बालक हैं, इनके लिये ऐसा हठ अच्छा नहीं। [जो धनुष रावण और बाण-जैसे जगद्विजयी वीरों के हिलाये न हिल सका, उसे तोड़ने के लिये मुनि विश्वामित्रजी का रामजी को आज्ञा देना और रामजी का उसे तोड़ने के लिये चल देना रानी को हठ जान पड़ा, इसलिये वे कहने लगीं कि गुरु विश्वामित्रजी को कोई समझाता भी नहीं।]
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध