नाथ जानि अस आयसु होऊ
नाथ जानि अस आयसु होऊ
चौपाई ४, दोहा २५३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ॥ कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं॥ ४ ॥
अर्थ
ऐसा जानकर हे नाथ! आज्ञा हो तो कुछ खेल करूँ, उसे भी देखिए। धनुष को कमल की नाल की तरह चढ़ाकर सौ योजन तक दौड़ा ले जाऊँ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध