नीकें निरखि नयन भरि सोभा
नीकें निरखि नयन भरि सोभा
चौपाई १, दोहा २५८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥ अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥ १ ॥
अर्थ
अच्छी तरह नेत्र भरकर श्रीरामजी की शोभा देखकर, फिर पिताजी के प्रण का स्मरण करके सीताजी का मन क्षुब्ध हो उठा। [वे मन-ही-मन कहने लगीं—] अहो! पिताजी ने बड़ा ही कठिन हठ ठाना है, वे लाभ-हानि कुछ भी नहीं समझ रहे हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध