सुनहु भानुकुल पंकज भानू
सुनहु भानुकुल पंकज भानू
चौपाई २, दोहा २५३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू॥ जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं॥ २ ॥
अर्थ
हे सूर्यकुलरूपी कमल के सूर्य! सुनिए, मैं स्वभाव ही से कहता हूँ, कुछ अभिमान करके नहीं, यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लूँ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध