कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा
चौपाई ४, दोहा २५६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥ रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा॥ ४ ॥
अर्थ
कहाँ घड़े से उत्पन्न होनेवाले [छोटे-से] मुनि अगस्त्य और कहाँ अपार समुद्र? किन्तु उन्होंने उसे सोख लिया, जिसका सुयश सारे संसार में छाया हुआ है। सूर्य मण्डल देखने में छोटा लगता है, पर उसके उदय होते ही तीनों लोकों का अन्धकार भाग जाता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध