सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी
चौपाई २, दोहा २५९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी॥ तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥ २ ॥
अर्थ
अपनी बढ़ी हुई व्याकुलता जानकर सीताजी सकुचा गयीं और धीरज धरकर हृदय में विश्वास ले आयीं कि यदि तन, मन और वचन से मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों में मेरा चित्त वास्तव में अनुरक्त है,
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध