गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी
चौपाई १, दोहा २५९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥ लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना॥ १ ॥
अर्थ
सीताजी की वाणीरूपी भ्रमरी को उनके मुखरूपी कमल ने रोक रखा है। लाजरूपी रात्रि को देखकर वह प्रकट नहीं हो रही है। नेत्रों का जल नेत्रों के कोने में ही रह जाता है। जैसे बड़े भारी कंजूस का सोना कोने में ही गड़ा रह जाता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध