बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे

चौपाई ४, दोहा २५५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥ तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं॥ ४ ॥

अर्थ

उन्होंने पितरों और देवताओं की वन्दना करके अपने पुण्यों का स्मरण किया। यदि हमारे पुण्यों का कुछ भी प्रभाव हो, तो हे गणेश गोसाईं! रामचन्द्रजी शिवजी के धनुष को कमल की डंडी की भाँति तोड़ डालें।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।

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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध