सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा
चौपाई ४, दोहा २५४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥ ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ॥ ४ ॥
अर्थ
गुरु के वचन सुनकर श्रीरामजी ने चरणों में सिर नवाया। उनके हृदय में न हर्ष आया, न विषाद; और वे सहज स्वभाव से उठ खड़े हुए, ऐसी शान से कि जवान सिंह भी लजाए।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध