रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई
चौपाई १, दोहा २५३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई॥ कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुलमनि जानी॥ १ ॥
अर्थ
रघुवंशियों में जहाँ कोई भी हो, उस समाज में ऐसे वचन कोई नहीं कहता, जैसे अनुचित वचन रघुकुलमणि श्रीरामजी को उपस्थित जानकर भी जनकजी ने कहे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी के धर्मयुक्त रोष और रघुवंश के पराक्रम के प्रकटीकरण का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध