सकल सोक संकुल नर नारी
सकल सोक संकुल नर नारी
चौपाई ४, दोहा २७७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी॥ पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू॥ ४ ॥
अर्थ
स्त्री-पुरुष सब शोक से पूर्ण थे। वह दिन बिना ही जल के बीत गया (भोजन की बात तो दूर रही, किसी ने जल तक नहीं पिया)। पशु, पक्षी और हिरनों तक ने कुछ आहार नहीं किया। तब प्रियजनों एवं कुटुम्बियों का तो विचार ही क्या किया जाय ?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।
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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन