बिषम बिषाद तोरावति धारा

चौपाई २, दोहा २७६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा॥ केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥ २ ॥

अर्थ

भयानक विषाद (शोक) ही उस नदी की तेज धारा है। भय और भ्रम (मोह) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं। विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं (उस विद्या का उपयोग नहीं कर सकते हैं), किसी को उसकी अटकल ही नहीं आती है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २७६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।

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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन