बोरति ग्यान बिराग करारे

चौपाई १, दोहा २७६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ १ ॥

अर्थ

यह करुणा की नदी [इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारों को डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदी में मिलते हैं; और सोच की लम्बी साँसें (आहें) ही वायु के झकोरों से उठनेवाली तरंगें हैं, जो धैर्यरूपी किनारे के उत्तम वृक्षों को तोड़ रही हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २७६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।

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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन