सुनि सनेहमय पुरजन बानी

चौपाई १, दोहा २७४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी॥ एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन॥ १ ॥

अर्थ

अयोध्यावासियों की प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी योग और वैराग्य की निन्दा करते हैं। इस प्रकार नित्यकर्म करके नगरवासी श्रीरामजी को पुलकित शरीर से प्रणाम करते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २७४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।

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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन