आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन
दोहा २७५ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ २७५ ॥
अर्थ
श्रीरामजी का आश्रम शान्त रस से परिपूर्ण पवित्र समुद्र है। जनकजी की सेना/समाज मानो करुणा की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [उस आश्रमरूपी शान्त-रस-सागर में मिलाने के लिए] लिये जा रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का दोहा २७५ है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।
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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन