जाइ न बरनि मनोहरताई
जाइ न बरनि मनोहरताई
चौपाई ३-४, दोहा २७९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥ तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥ देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥ दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥ ३-४ ॥
अर्थ
वन की मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजी की पहुनाई कर रही है। तब जनकपुरवासी सब लोग नहा-नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनि की आज्ञा पाकर, सुन्दर वृक्षों को देख-देखकर प्रेम में भरकर जहाँ-तहाँ उतरने लगे। पवित्र, सुन्दर और अमृत के समान अनेकों प्रकार के पत्ते, फल, मूल और कन्द--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई ३-४, दोहा २७९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।
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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन