लरिकाइहि तें रघुबर बानी

चौपाई ३, दोहा २७४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लरिकाइहि तें रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी॥ सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥ ३ ॥

अर्थ

लड़कपन से ही श्रीरामजी की यह बानी है कि वे प्रेम को पहचानकर नीति का पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोच के समुद्र हैं। वे सुन्दर मुख के [या सबके अनुकूल रहने वाले], सुन्दर नेत्र वाले [या सबको कृपा और प्रेम की दृष्टि से देखने वाले] और सरल स्वभाव हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २७४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।

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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन