सुबस बसउ फिरि सहित समाजा

चौपाई ४, दोहा २७३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥ एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू॥ ४ ॥

अर्थ

फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजी को युवराज बनावें। हे देव! इस सुखरूपी अमृत से सींचकर सब किसी को जगत में जीने का लाभ दीजिये।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।

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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन