अटनु राम गिरि बन तापस थल
अटनु राम गिरि बन तापस थल
चौपाई ४, दोहा २८० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥ सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥ ४ ॥
अर्थ
श्रीरामजी के पर्वत, वन और तपस्वियों के स्थानों में घूमना और अमृत के समान कन्द, मूल, फलों का भोजन। चौदह वर्ष सुख के साथ पल के समान हो जायेंगे (बीत जायेंगे), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।
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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन