गरइ गलानि कुटिल कैकेई
गरइ गलानि कुटिल कैकेई
चौपाई १, दोहा २७३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥ अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी॥ १ ॥
अर्थ
कुटिल कैकेयी मन-ही-मन ग्लानि (पश्चात्ताप) से गली जाती है। किससे कहे और किसको दोष दे? ऐसा मन में लाकर नर-नारी प्रसन्न हुए कि [ अच्छा हुआ, जनकजी के आने से] चार दिन और रहना हो गया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।
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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन