राम दरस लालसा उछाहू

चौपाई २, दोहा २७५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू॥ मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही॥ २ ॥

अर्थ

श्रीरामजी के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण किसी को मार्ग की थकावट और क्लेश नहीं है। मन तो वहाँ है जहाँ रघुबर और वैदेही हैं। बिना मन के तन के सुख-दुःख की सुध किसको हो?

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २७५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन