भाइ सचिव गुर पुरजन साथा

चौपाई १, दोहा २७५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा॥ गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं॥ १ ॥

अर्थ

भाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियों को साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे चले। जनकजी ने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ को देखा, त्यों ही प्रणाम करके रथ छोड़ दिया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २७५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।

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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन