जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा

चौपाई १, दोहा २७७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥ तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई॥ १ ॥

अर्थ

जिन राजा जनक का ज्ञानरूपी सूर्य भव (आवागमन) रूपी रात्रि का नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलों को खिला देती हैं (आनन्दित करती हैं), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं ? यह तो श्रीसीतारामजी के प्रेम की महिमा है! [ अर्थात् राजा जनक की यह दशा श्रीसीतारामजी के अलौकिक प्रेम के कारण हुई, लौकिक मोह-ममता के कारण नहीं। जो लौकिक मोह-ममता को पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजी का प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता]।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा जनक का चित्रकूट आगमन और कोल-किरात सहित सभी का प्रेमपूर्ण मिलन का वर्णन है।

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जनकजी का चित्रकूट आगमन, सबका मिलन