शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर की ओर प्रस्थान

शबरी अपनी सरल, निष्कपट भक्ति से श्रीराम का स्वागत करती हैं। प्रभु उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश देकर कृतार्थ करते हैं और फिर पंपासर की ओर प्रस्थान करते हैं।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण १६ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥ सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥ ३ ॥

अर्थ:

उदार श्रीरामजी उसे गति देकर शबरीजी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने श्रीरामचन्द्रजी को घर में आये देखा, तब मुनि के वचनों को समझकर उनका मन प्रसन्न हो गया।

चौपाई

सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥ स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥ ४ ॥

अर्थ:

कमल-सदृश नेत्र और विशाल भुजावाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरीजी लिपट पड़ीं।

चौपाई

प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥ सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे॥ ५ ॥

अर्थ:

वे प्रेम में मग्र हो गयीं, मुख से वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही हैं। फिर उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोये और फिर उन्हें सुन्दर आसनों पर बैठाया।

दोहा

कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥ ३४ ॥

अर्थ:

उन्होंने अत्यन्त रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्रीरामजी को दिये। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेमसहित खाया।

दोहा 35 के अंतर्गत
चौपाई

पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥ केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥ १ ॥

अर्थ:

फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। [उन्होंने कहा--] मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जाति की और अत्यन्त मूढ़बुद्धि हूँ।

चौपाई

अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥ कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥ २ ॥

अर्थ:

जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यन्त अधम हैं; और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मन्दबुद्धि हूँ। श्रीरघुनाथजी ने कहा--हे भामिनि! मेरी बात सुन। मैं तो केवल एक भक्ति ही का सम्बन्ध मानता हूँ।

चौपाई

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥ ३ ॥

अर्थ:

जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, परिजन, गुण और चतुराई—इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल [शोभाहीन] दिखायी पड़ता है।

चौपाई

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥ प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का संग। दूसरी भक्ति है मेरी कथा-प्रसंग में प्रेम।

दोहा

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥ ३५ ॥

अर्थ:

तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरणकमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहों का गान करे।

दोहा 36 के अंतर्गत
चौपाई

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥ छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥ १ ॥

अर्थ:

मेरे (राम) मन्त्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास—यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहुत-से कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म में लगे रहना।

चौपाई

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥ आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥ २ ॥

अर्थ:

सातवीं भक्ति है जग भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना।

चौपाई

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥ नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥ ३ ॥

अर्थ:

नवीं भक्ति है सरलता और सब के साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नौ में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो--।

चौपाई

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥ जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे भामिनि! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है। फिर तुझमें तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है।

चौपाई

मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥ जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥ ५ ॥

अर्थ:

मेरे दर्शन का परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकी की कुछ खबर जानती हो तो बता।

चौपाई

पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥ सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥ ६ ॥

अर्थ:

पंपा नामक सरोवर को जाइये, हे रघुनाथजी! वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतायेगा। हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं !

चौपाई

बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥ ७ ॥

अर्थ:

बार-बार प्रभु के चरणों में सिर नवाकर, प्रेम सहित उसने सब कथा सुनायी।

छन्द

कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥ नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥

अर्थ:

सब कथा कहकर भगवान् के मुख के दर्शन कर, हृदय में उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्यागकर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरि पद में लीन हो गयी, जहाँ से लौटना नहीं होता। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत-से मत—ये सब शोक प्रद हैं; हे मनुष्यों! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजी के चरणों में प्रेम करो॥

दोहा

जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि। महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि॥ ३६ ॥

अर्थ:

जो नीच जाति की और पापों की जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्री को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन! तू ऐसे प्रभु को भूलकर सुख चाहता है ?

दोहा 37 के अंतर्गत
चौपाई

चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ॥ बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने उस वन को भी छोड़ दिया और वे आगे चले। दोनों भाई अतुलनीय बलवान् और मनुष्यों में सिंह के समान हैं। प्रभु विरही की तरह विषाद करते हुए अनेकों कथाएँ और संवाद कहते हैं--।

चौपाई

लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥ नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥ २ ॥

अर्थ:

हे लक्ष्मण! जरा वन की शोभा तो देखो। इसे देखकर किस का मन क्षुब्ध नहीं होगा? पक्षी और पशुओं के समूह सभी स्त्री सहित हैं। मानो वे मेरी निंदा कर रहे हैं।

चौपाई

हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥ तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥ ३ ॥

अर्थ:

हमें देखकर [जब डर के मारे] हिरनों के झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं-- तुमको भय नहीं है। तुम तो साधारण हिरनों से पैदा हुए हो, अतः तुम आनन्द करो। ये तो सोने का हिरन खोजने आये हैं।

चौपाई

संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥ सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ॥ ४ ॥

अर्थ:

हाथी हथिनियों को साथ लगा लेते हैं। वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं [कि स्त्री को कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये]। भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्र को भी बार-बार देखते रहना चाहिये। अच्छी तरह सेवा किये हुए भी राजा को वश में नहीं समझना चाहिये।

चौपाई

राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥ देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥ ५ ॥

अर्थ:

और स्त्री को चाहे हृदय में ही क्यों न रखा जाय; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसी के वश में नहीं रहते। हे तात! इस सुन्दर वसन्त को तो देखो। प्रिया के बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है।

दोहा

बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल। सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल॥ ३७ (क) ॥

अर्थ:

मुझे विरह से व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेव ने वन, भौंरों और पक्षियों को साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया।

दोहा

देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात। डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात॥ ३७ (ख) ॥

अर्थ:

परन्तु जब उसका दूत यह देख गया कि मैं भाई के साथ हूँ (अकेला नहीं हूँ), तब उसकी बात सुनकर कामदेव ने मानो सेना को रोककर डेरा डाल दिया है।

दोहा 38 के अंतर्गत
चौपाई

बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी॥ कदलि ताल बर धुजा पताका। देखि न मोह धीर मन जाका॥ १ ॥

अर्थ:

विशाल वृक्षों में लताएँ उलझी हुई ऐसी मालूम होती हैं मानो नाना प्रकार के तंबू तान दिये गये हैं। केला और ताड़ सुन्दर ध्वजा-पताका के समान हैं। इन्हें देखकर वही नहीं मोहित होता जिसका मन धीर है।

चौपाई

बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना॥ कहुँ कहुँ सुंदर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए॥ २ ॥

अर्थ:

अनेकों वृक्ष नाना प्रकार से फूले हुए हैं। मानो अलग-अलग बाना (वर्दी) धारण किये हुए बहुत-से तीरंदाज हों। कहीं-कहीं सुंदर वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मानो योद्धा लोग अलग-अलग होकर छावनी डाले हों।

चौपाई

कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते॥ मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी॥ ३ ॥

अर्थ:

कोयलें कूज रही हैं, वही मानो मतवाले हाथी [चिघ्घाड़ रहे] हैं। ढेक और महोख पक्षी मानो ऊँट और खच्चर हैं। मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस मानो सब सुंदर ताजी (अरबी) घोड़े हैं।

चौपाई

तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरूथा॥ रथ गिरि सिला दुंदुभीं झरना। चातक बंदी गुन गन बरना॥ ४ ॥

अर्थ:

तीतर और बटेर पैदल सिपाहियों के झुंड हैं। कामदेव की सेना का वर्णन नहीं हो सकता। पर्वतों की शिलाएँ रथ और जल के झरने नगाड़े हैं। पपीहे भाट हैं, जो गुण-समूह (विरदावली) का वर्णन करते हैं।

चौपाई

मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई॥ चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें॥ ५ ॥

अर्थ:

भौंरों की गुंजार भेरी और शहनाई है। शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा मानो दूत का काम लेकर आयी है। इस प्रकार चतुरंगिनी सेना साथ लिये कामदेव मानो सबको चुनौती देता हुआ विचर रहा है।

चौपाई

लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका॥ एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी॥ ६ ॥

अर्थ:

हे लक्ष्मण! कामदेव की इस सेना को देखकर जो धीर बने रहते हैं, जगत् में उन्हीं की [वीरों में] प्रतिष्ठा होती है। इस कामदेव के एक स्त्री का बड़ा भारी बल है। उससे जो बच जाय, वही श्रेष्ठ योद्धा है।

दोहा

तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ। मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ॥ ३८ (क) ॥

अर्थ:

हे तात! काम, क्रोध और लोभ-ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं। ये विज्ञान के धाम मुनियों के भी मनों को पलभर में क्षुब्ध कर देते हैं।

दोहा

लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि। क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि॥ ३८ (ख) ॥

अर्थ:

लोभ को इच्छा और दम्भ का बल है, काम को केवल स्त्री का बल है और क्रोध को कठोर वचनों का बल है; श्रेष्ठ मुनि विचार कर ऐसा कहते हैं।

दोहा 39 के अंतर्गत
चौपाई

गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी॥ कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती ! श्रीरामचन्द्रजी गुणातीत (तीनों गुणों से परे), चराचर जगत् के स्वामी और सबके अंतर की जाननेवाले हैं। [उपर्युक्त बातें कहकर] उन्होंने कामी लोगों की दीनता (बेबसी) दिखलायी है और धीर (विवेकी) पुरुषों के मन में वैराग्य को दृढ़ किया है।

चौपाई

क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया॥ सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला॥ २ ॥

अर्थ:

क्रोध, काम, लोभ, मद और माया-ये सभी श्रीरामजी की दया से छूट जाते हैं। वह नट (नटराजभगवान्) जिस पर प्रसन्न होता है, वह मनुष्य इन्द्रजाल (माया) में नहीं भूलता।

चौपाई

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥ पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा॥ ३ ॥

अर्थ:

हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ--हरि का भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न [की भाँति झूठा] है। फिर प्रभु श्रीरामजी पंपा नामक सुंदर और गहरे सरोवर के तीर पर गये।

चौपाई

संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी॥ जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

उसका जल संतों के हृदय-जैसा निर्मल है। मन को हरनेवाले सुंदर चार घाट बाँधे हुए हैं। भाँति-भाँति के पशु जहाँ-तहाँ जल पी रहे हैं। मानो उदार दानी पुरुषों के घर याचकों की भीड़ लगी हो !

दोहा

पुरइनि सघन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म। मायाछन्न न देखिऐ जैसें निर्गुन ब्रह्म॥ ३९ (क) ॥

अर्थ:

घनी पुरइनों (कमल के पत्तों) की आड़ में जल का जल्दी पता नहीं मिलता। जैसे माया से ढके रहने के कारण निर्गुण ब्रह्म नहीं दीखता।

दोहा

सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं। जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं॥ ३९ (ख) ॥

अर्थ:

उस सरोवर के अत्यन्त अथाह जल में सब मछलियाँ सदा एकरस (एक समान) सुखी रहती हैं। जैसे धर्मशील पुरुषों के सब दिन सुखपूर्वक बीतते हैं।

दोहा 40 के अंतर्गत
चौपाई

बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा॥ बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा॥ १ ॥

अर्थ:

उसमें रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं। बहुत-से भौरे मधुर स्वर से गुंजार कर रहे हैं। जल के मुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं, मानो प्रभु को देखकर उनकी प्रशंसा कर रहे हों।

चौपाई

चक्रबाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई॥ सुंदर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई॥ २ ॥

अर्थ:

चक्रवाक, बगुले आदि पक्षियों का समुदाय देखते ही बनता है, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुंदर पक्षियों की बोली बड़ी सुहावनी लगती है, मानो [रास्ते में] जाते हुए पथिक को बुला लेती हो।

चौपाई

ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए॥ चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला॥ ३ ॥

अर्थ:

उस झील (पंपासरोवर) के समीप मुनियों ने आश्रम बना रखे हैं। उसके चारों ओर वन के सुंदर वृक्ष हैं। चम्पा, मौलसिरी, कदम्ब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक और आम आदि--।

चौपाई

नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना॥ सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

बहुत प्रकार के वृक्ष नये-नये पत्तों और [सुगन्धित] पुष्पों से युक्त हैं, [जिनपर ] भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं। स्वभाव से ही शीतल, मन्द, सुगन्धित एवं मन को हरनेवाली हवा सदा बहती रहती है।

चौपाई

कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

कोयलें “कुहू” “कुहू” का शब्द कर रही हैं। उनकी रसीली बोली सुनकर मुनियों का भी ध्यान टूट जाता है।

दोहा

फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ। पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ॥ ४० ॥

अर्थ:

फलों के बोझ से झुककर सारे वृक्ष पृथ्वी के पास आ लगे हैं, जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर [विनय से] झुक जाते हैं।

दोहा 41 के अंतर्गत
चौपाई

देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा॥ देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी ने अत्यन्त सुन्दर तालाब देखकर स्नान किया और परम सुख पाया। एक सुन्दर उत्तम वृक्ष की छाया देखकर श्रीरघुनाथजी छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित बैठ गये।

चौपाई

तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए॥ बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला॥ २ ॥

अर्थ:

फिर वहाँ सब देवता और मुनि आये और स्तुति करके अपने धाम को चले गये। कृपालु श्रीरामजी परम प्रसन्न बैठे हुए छोटे भाई लक्ष्मणजी से रसीली कथाएँ कह रहे हैं।