शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर की ओर प्रस्थान
शबरी अपनी सरल, निष्कपट भक्ति से श्रीराम का स्वागत करती हैं। प्रभु उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश देकर कृतार्थ करते हैं और फिर पंपासर की ओर प्रस्थान करते हैं।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण १६ / १८
प्रकरण पाठ
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥ केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥ १ ॥
अर्थ:
फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। [उन्होंने कहा--] मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जाति की और अत्यन्त मूढ़बुद्धि हूँ।
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥ कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥ २ ॥
अर्थ:
जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यन्त अधम हैं; और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मन्दबुद्धि हूँ। श्रीरघुनाथजी ने कहा--हे भामिनि! मेरी बात सुन। मैं तो केवल एक भक्ति ही का सम्बन्ध मानता हूँ।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥ छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥ १ ॥
अर्थ:
मेरे (राम) मन्त्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास—यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहुत-से कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म में लगे रहना।
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥ आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥ २ ॥
अर्थ:
सातवीं भक्ति है जग भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना।
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥ नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥ ३ ॥
अर्थ:
नवीं भक्ति है सरलता और सब के साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नौ में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो--।
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥ नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥
अर्थ:
सब कथा कहकर भगवान् के मुख के दर्शन कर, हृदय में उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्यागकर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरि पद में लीन हो गयी, जहाँ से लौटना नहीं होता। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत-से मत—ये सब शोक प्रद हैं; हे मनुष्यों! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजी के चरणों में प्रेम करो॥
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥ तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥ ३ ॥
अर्थ:
हमें देखकर [जब डर के मारे] हिरनों के झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं-- तुमको भय नहीं है। तुम तो साधारण हिरनों से पैदा हुए हो, अतः तुम आनन्द करो। ये तो सोने का हिरन खोजने आये हैं।
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥ सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ॥ ४ ॥
अर्थ:
हाथी हथिनियों को साथ लगा लेते हैं। वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं [कि स्त्री को कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये]। भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्र को भी बार-बार देखते रहना चाहिये। अच्छी तरह सेवा किये हुए भी राजा को वश में नहीं समझना चाहिये।
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥ देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥ ५ ॥
अर्थ:
और स्त्री को चाहे हृदय में ही क्यों न रखा जाय; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसी के वश में नहीं रहते। हे तात! इस सुन्दर वसन्त को तो देखो। प्रिया के बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है।
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी॥ कदलि ताल बर धुजा पताका। देखि न मोह धीर मन जाका॥ १ ॥
अर्थ:
विशाल वृक्षों में लताएँ उलझी हुई ऐसी मालूम होती हैं मानो नाना प्रकार के तंबू तान दिये गये हैं। केला और ताड़ सुन्दर ध्वजा-पताका के समान हैं। इन्हें देखकर वही नहीं मोहित होता जिसका मन धीर है।
बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना॥ कहुँ कहुँ सुंदर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए॥ २ ॥
अर्थ:
अनेकों वृक्ष नाना प्रकार से फूले हुए हैं। मानो अलग-अलग बाना (वर्दी) धारण किये हुए बहुत-से तीरंदाज हों। कहीं-कहीं सुंदर वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मानो योद्धा लोग अलग-अलग होकर छावनी डाले हों।
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका॥ एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी॥ ६ ॥
अर्थ:
हे लक्ष्मण! कामदेव की इस सेना को देखकर जो धीर बने रहते हैं, जगत् में उन्हीं की [वीरों में] प्रतिष्ठा होती है। इस कामदेव के एक स्त्री का बड़ा भारी बल है। उससे जो बच जाय, वही श्रेष्ठ योद्धा है।
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी॥ कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई॥ १ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती ! श्रीरामचन्द्रजी गुणातीत (तीनों गुणों से परे), चराचर जगत् के स्वामी और सबके अंतर की जाननेवाले हैं। [उपर्युक्त बातें कहकर] उन्होंने कामी लोगों की दीनता (बेबसी) दिखलायी है और धीर (विवेकी) पुरुषों के मन में वैराग्य को दृढ़ किया है।