कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख

छन्द, दोहा ३६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

छन्द पाठ

कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥ नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥

अर्थ

सब कथा कहकर भगवान् के मुख के दर्शन कर, हृदय में उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्यागकर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरि पद में लीन हो गयी, जहाँ से लौटना नहीं होता। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत-से मत—ये सब शोक प्रद हैं; हे मनुष्यों! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजी के चरणों में प्रेम करो॥

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का छन्द, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।

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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति