तीतिर लावक पदचर जूथा
तीतिर लावक पदचर जूथा
चौपाई ४, दोहा ३८ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरूथा॥ रथ गिरि सिला दुंदुभीं झरना। चातक बंदी गुन गन बरना॥ ४ ॥
अर्थ
तीतर और बटेर पैदल सिपाहियों के झुंड हैं। कामदेव की सेना का वर्णन नहीं हो सकता। पर्वतों की शिलाएँ रथ और जल के झरने नगाड़े हैं। पपीहे भाट हैं, जो गुण-समूह (विरदावली) का वर्णन करते हैं।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।
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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति