कबंध उद्धार

वन में भयंकर कबंध श्रीराम और लक्ष्मणजी का मार्ग रोकता है। प्रभु उसके उद्धार का कारण बनते हैं, और शापमुक्त होकर वह अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त करता है।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण १५ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥ गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत जोगी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी अत्यन्त कोमल चित्तवाले, दीनदयालु और बिना ही कारण कृपालु हैं। गीध [पक्षियों में भी] अधम पक्षी और मांसाहारी था, उसको भी वह दुर्लभ गति दी, जिसे योगीजन माँगते रहते हैं।

चौपाई

सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी॥ पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई॥ २ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती! सुनो, वे लोग अभागे हैं जो भगवान् को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं। फिर दोनों भाई सीताजी को खोजते हुए आगे चले। वे वन की सघनता देखते जाते हैं।

चौपाई

संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन॥ आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता॥ ३ ॥

अर्थ:

वह सघन वन लताओं और वृक्षों से भरा है। उसमें बहुत-से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह रहते हैं। श्रीरामजी ने रास्ते में आते हुए कबंध राक्षस को मार डाला। उसने अपने शाप की सारी बात कही।

चौपाई

दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥ सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥ ४ ॥

अर्थ:

[वह बोला--] दुर्वासाजी ने मुझे शाप दिया था। अब प्रभु के चरणों को देखने से वह पाप मिट गया। [ श्रीरामजी ने कहा-- ] हे गन्धर्व! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुल से द्रोह करनेवाला मुझे नहीं सुहाता।

दोहा

मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव। मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव॥ ३३ ॥

अर्थ:

मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणों की सेवा करता है, मुझ समेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वश में हो जाते हैं।

दोहा 34 के अंतर्गत
चौपाई

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥ पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥ १ ॥

अर्थ:

शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुण से हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है। और गुणगणों से युक्त और ज्ञान में निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है।

चौपाई

कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा॥ रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी ने अपना धर्म (भागवत-धर्म) कहकर उसे समझाया। अपने चरणों में प्रेम देखकर वह उनके मन को भाया। तदनन्तर श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों में सिर नवाकर वह अपनी गति (गन्धर्व का स्वरूप) पाकर आकाश में चला गया।