कबंध उद्धार
वन में भयंकर कबंध श्रीराम और लक्ष्मणजी का मार्ग रोकता है। प्रभु उसके उद्धार का कारण बनते हैं, और शापमुक्त होकर वह अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त करता है।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण १५ / १८
प्रकरण पाठ
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥ सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥ ४ ॥
अर्थ:
[वह बोला--] दुर्वासाजी ने मुझे शाप दिया था। अब प्रभु के चरणों को देखने से वह पाप मिट गया। [ श्रीरामजी ने कहा-- ] हे गन्धर्व! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुल से द्रोह करनेवाला मुझे नहीं सुहाता।
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥ पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥ १ ॥
अर्थ:
शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुण से हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है। और गुणगणों से युक्त और ज्ञान में निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है।
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा॥ रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी ने अपना धर्म (भागवत-धर्म) कहकर उसे समझाया। अपने चरणों में प्रेम देखकर वह उनके मन को भाया। तदनन्तर श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों में सिर नवाकर वह अपनी गति (गन्धर्व का स्वरूप) पाकर आकाश में चला गया।