सातवँ सम मोहि मय जग देखा

चौपाई २, दोहा ३६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥ आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥ २ ॥

अर्थ

सातवीं भक्ति है जग भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति