हमहि देखि मृग निकर पराहीं
हमहि देखि मृग निकर पराहीं
चौपाई ३, दोहा ३७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥ तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥ ३ ॥
अर्थ
हमें देखकर [जब डर के मारे] हिरनों के झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं-- तुमको भय नहीं है। तुम तो साधारण हिरनों से पैदा हुए हो, अतः तुम आनन्द करो। ये तो सोने का हिरन खोजने आये हैं।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।
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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति