राखिअ नारि जदपि उर माहीं
राखिअ नारि जदपि उर माहीं
चौपाई ५, दोहा ३७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥ देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥ ५ ॥
अर्थ
और स्त्री को चाहे हृदय में ही क्यों न रखा जाय; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसी के वश में नहीं रहते। हे तात! इस सुन्दर वसन्त को तो देखो। प्रिया के बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।
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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति