चक्रबाक बक खग समुदाई

चौपाई २, दोहा ४० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

चक्रबाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई॥ सुंदर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई॥ २ ॥

अर्थ

चक्रवाक, बगुले आदि पक्षियों का समुदाय देखते ही बनता है, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुंदर पक्षियों की बोली बड़ी सुहावनी लगती है, मानो [रास्ते में] जाते हुए पथिक को बुला लेती हो।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।

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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति