नारद-राम संवाद

देवर्षि नारद श्रीराम के सम्मुख भक्ति और प्रभु-कृपा के गूढ़ तत्त्वों पर प्रश्न उठाते हैं। संवाद के माध्यम से नाम, प्रेम और ईश्वर की अनुकंपा का महत्त्व प्रकट होता है।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण १७ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी॥ मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा॥ ३ ॥

अर्थ:

भगवान् को विरहयुक्त देखकर नारदजी के मन में विशेष रूप से सोच हुआ। [उन्होंने विचार किया कि] मेरे ही शाप को स्वीकार करके श्रीरामजी नाना प्रकार के दुःखों का भार सह रहे हैं (दुःख उठा रहे हैं)।

चौपाई

ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई॥ यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसे (भक्तवत्सल) प्रभु को जाकर देखूँ। फिर ऐसा अवसर न बन आवेगा। यह विचार कर नारदजी हाथ में वीणा लिये हुए वहाँ गये, जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे।

चौपाई

गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी॥ करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई॥ ५ ॥

अर्थ:

वे कोमल वाणी से प्रेम के साथ बहुत प्रकार से बखान-बखानकर रामचरित का गान कर रहे थे। दण्डवत् करते देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने नारदजी को उठा लिया और बहुत देर तक हृदय से लगाये रखा।

चौपाई

स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे॥ ६ ॥

अर्थ:

फिर स्वागत पूछकर पास बैठा लिया। लक्ष्मणजी ने आदर के साथ उनके चरण धोये।

दोहा

नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि। नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि॥ ४१ ॥

अर्थ:

बहुत प्रकार से विनती करके और प्रभु को मन में प्रसन्न जानकर तब नारदजी कमल के समान हाथ जोड़कर वचन बोले--।

दोहा 42 के अंतर्गत
चौपाई

सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक॥ देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी॥ १ ॥

अर्थ:

हे स्वभाव से ही उदार श्रीरघुनाथजी ! सुनिये। आप सुन्दर अगम और सुगम वर के देनेवाले हैं। हे स्वामी! मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिये, यद्यपि आप अन्तर्यामी होने के नाते सब जानते ही हैं।

चौपाई

जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ॥ कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी॥ २ ॥

अर्थ:

[श्रीरामजी ने कहा--] हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिवर! तुम नहीं माँग सकते?

चौपाई

जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें॥ तब नारद बोले हरषाई। अस बर मागउँ करउँ ढिठाई॥ ३ ॥

अर्थ:

मुझे भक्त के लिये कुछ भी अदेय नहीं है। ऐसा विश्वास भूलकर भी मत छोड़ो। तब नारदजी हर्षित होकर बोले-मैं ऐसा वर माँगता हूँ, यह धृष्टता करता हूँ--।

चौपाई

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥ राम सकल नामन्ह तें अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥ ४ ॥

अर्थ:

यद्यपि प्रभु के अनेकों नाम हैं और श्रुति कहती है कि वे एक से एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामों से बढ़कर हो और पापरूपी पक्षियों के समूह के लिये यह वधिक के समान हो।

दोहा

राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम। अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम॥ ४२ (क) ॥

अर्थ:

आपकी भक्ति पूर्णिमा की रात्रि है; उसमें 'राम' नाम यही पूर्ण चन्द्रमा होकर और अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तों के हृदय रूपी निर्मल आकाश में निवास करें।

दोहा

एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ। तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ॥ ४२ (ख) ॥

अर्थ:

कृपासिंधु श्रीरघुनाथजी ने मुनि से 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। तब नारदजी ने मन में अत्यन्त हर्षित होकर प्रभु के चरणों में मस्तक नवाया।

दोहा 43 के अंतर्गत
चौपाई

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी॥ राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी को अत्यन्त प्रसन्न जानकर नारदजी फिर कोमल वाणी बोले-हे रामजी! हे रघुनाथजी ! सुनिये, जब आपने अपनी माया को प्रेरित करके मुझे मोहित किया था,।

चौपाई

तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥ सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥ २ ॥

अर्थ:

तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया? [प्रभु बोले--] हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्ष के साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं,।

चौपाई

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥ गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालक की रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँप को पकड़ने जाता है तो वहाँ माता उसे अपने हाथों से अलग करके बचा लेती है।

चौपाई

प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥ मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥ ४ ॥

अर्थ:

सयाना हो जाने पर उस पुत्र पर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती (अर्थात् मातृपरायण शिशु की तरह फिर उसको बचाने की चिन्ता नहीं करती; क्योंकि वह माता पर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है)। ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्र के समान है और [तुम्हारे-जैसा] अपने बल का मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है।

चौपाई

जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥ यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है और उसे अपना बल होता है। पर काम-क्रोधरूपी शत्रु तो दोनों के लिये हैं। [भक्त के शत्रुओं को मारने की जिम्मेदारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बल को माननेवाले ज्ञानी के शत्रुओं का नाश करने की जिम्मेदारी मुझपर नहीं है। ऐसा विचारकर पण्डितजन (बुद्धिमान् लोग) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होने पर भी भक्ति को नहीं छोड़ते।

दोहा

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि। तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि॥ ४३ ॥

अर्थ:

काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह (अज्ञान) की प्रबल सेना है। इनमें मायारूपिणी (माया की साक्षात् मूर्ति) स्त्री तो अत्यन्त दारुण दुःख देनेवाली है।

दोहा 44 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता॥ जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी॥ १ ॥

अर्थ:

हे मुनि! सुनो, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोहरूपी वन [को विकसित करने] के लिये स्त्री वसन्त ऋतु के समान है। जप, तप, नियमरूपी सम्पूर्ण जल के स्थानों को स्त्री ग्रीष्म रूप होकर सर्वथा सोख लेती है।

चौपाई

काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका॥ दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई॥ २ ॥

अर्थ:

काम, क्रोध, मद और मत्सर (डाह) आदि मेढक हैं। इनको वर्षा-ऋतु होकर हर्ष प्रदान करनेवाली एकमात्र यही (स्त्री) है। बुरी वासनाएँ कुमुदों के समूह हैं। उनको सदैव सुख देनेवाली यह शरद् ऋतु है।

चौपाई

धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा॥ पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई॥ ३ ॥

अर्थ:

समस्त धर्म कमलों के झुंड हैं। यह नीच (विषयजन्य) सुख देनेवाली स्त्री हिम-ऋतु होकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवास का समूह (वन) स्त्रीरूपी शिशिर-ऋतु को पाकर हरा-भरा हो जाता है।

चौपाई

पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी॥ बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥ ४ ॥

अर्थ:

पापरूपी उल्लुओं के समूह के लिये यह स्त्री सुख देनेवाली घोर अन्धकारमयी रात्रि है। बुद्धि, बल, शील और सत्य--ये सब मछलियाँ हैं और उन [को फँसाकर नष्ट करने] के लिये स्त्री बंसी के समान है, चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं।

दोहा

अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि। ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि॥ ४४ ॥

अर्थ:

युवती स्त्री अवगुणों की मूल, पीड़ा देनेवाली और सब दुःखों की खान है। इसलिये हे मुनि! मैंने जी में ऐसा जानकर तुमको विवाह करने से रोका था।

दोहा 45 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए॥ कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी के सुन्दर वचन सुनकर मुनि का शरीर पुलकित हो गया और नेत्र [प्रेमाश्रुओं के जल से] भर आये। [वे मन-ही-मन कहने लगे--] कहो तो किस प्रभु की ऐसी रीति है, जिसका सेवक पर इतना ममत्व और प्रेम हो।

चौपाई

जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी॥ पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद॥ २ ॥

अर्थ:

जो मनुष्य भ्रम को त्यागकर ऐसे प्रभु को नहीं भजते, वे ज्ञान के कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं। फिर नारद मुनि आदरसहित बोले--हे राम, विज्ञान-विशारद! सुनिए--।

चौपाई

संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥ सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥ ३ ॥

अर्थ:

हे रघुवीर! हे भव-भंजन, भीर! अब कृपा कर संतों के लक्षण कहिये। [श्रीरामजी ने कहा--] हे मुनि! सुनो, मैं संतों के गुणों को कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूँ।