नारद-राम संवाद
देवर्षि नारद श्रीराम के सम्मुख भक्ति और प्रभु-कृपा के गूढ़ तत्त्वों पर प्रश्न उठाते हैं। संवाद के माध्यम से नाम, प्रेम और ईश्वर की अनुकंपा का महत्त्व प्रकट होता है।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण १७ / १८
प्रकरण पाठ
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ॥ कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी॥ २ ॥
अर्थ:
[श्रीरामजी ने कहा--] हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिवर! तुम नहीं माँग सकते?
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥ सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥ २ ॥
अर्थ:
तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया? [प्रभु बोले--] हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्ष के साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं,।
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥ मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥ ४ ॥
अर्थ:
सयाना हो जाने पर उस पुत्र पर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती (अर्थात् मातृपरायण शिशु की तरह फिर उसको बचाने की चिन्ता नहीं करती; क्योंकि वह माता पर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है)। ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्र के समान है और [तुम्हारे-जैसा] अपने बल का मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है।
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥ यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥ ५ ॥
अर्थ:
मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है और उसे अपना बल होता है। पर काम-क्रोधरूपी शत्रु तो दोनों के लिये हैं। [भक्त के शत्रुओं को मारने की जिम्मेदारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बल को माननेवाले ज्ञानी के शत्रुओं का नाश करने की जिम्मेदारी मुझपर नहीं है। ऐसा विचारकर पण्डितजन (बुद्धिमान् लोग) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होने पर भी भक्ति को नहीं छोड़ते।
सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता॥ जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी॥ १ ॥
अर्थ:
हे मुनि! सुनो, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोहरूपी वन [को विकसित करने] के लिये स्त्री वसन्त ऋतु के समान है। जप, तप, नियमरूपी सम्पूर्ण जल के स्थानों को स्त्री ग्रीष्म रूप होकर सर्वथा सोख लेती है।
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा॥ पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई॥ ३ ॥
अर्थ:
समस्त धर्म कमलों के झुंड हैं। यह नीच (विषयजन्य) सुख देनेवाली स्त्री हिम-ऋतु होकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवास का समूह (वन) स्त्रीरूपी शिशिर-ऋतु को पाकर हरा-भरा हो जाता है।
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी॥ बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥ ४ ॥
अर्थ:
पापरूपी उल्लुओं के समूह के लिये यह स्त्री सुख देनेवाली घोर अन्धकारमयी रात्रि है। बुद्धि, बल, शील और सत्य--ये सब मछलियाँ हैं और उन [को फँसाकर नष्ट करने] के लिये स्त्री बंसी के समान है, चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं।
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए॥ कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरघुनाथजी के सुन्दर वचन सुनकर मुनि का शरीर पुलकित हो गया और नेत्र [प्रेमाश्रुओं के जल से] भर आये। [वे मन-ही-मन कहने लगे--] कहो तो किस प्रभु की ऐसी रीति है, जिसका सेवक पर इतना ममत्व और प्रेम हो।