लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा

चौपाई २, दोहा ३७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥ नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥ २ ॥

अर्थ

हे लक्ष्मण! जरा वन की शोभा तो देखो। इसे देखकर किस का मन क्षुब्ध नहीं होगा? पक्षी और पशुओं के समूह सभी स्त्री सहित हैं। मानो वे मेरी निंदा कर रहे हैं।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति