संग लाइ करिनीं करि लेहीं
संग लाइ करिनीं करि लेहीं
चौपाई ४, दोहा ३७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥ सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ॥ ४ ॥
अर्थ
हाथी हथिनियों को साथ लगा लेते हैं। वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं [कि स्त्री को कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये]। भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्र को भी बार-बार देखते रहना चाहिये। अच्छी तरह सेवा किये हुए भी राजा को वश में नहीं समझना चाहिये।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।
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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति