बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट

दोहा ३७ (क) · अरण्यकाण्ड

दोहा पाठ

बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल। सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल॥ ३७ (क) ॥

अर्थ

मुझे विरह से व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेव ने वन, भौंरों और पक्षियों को साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का दोहा ३७ (क) है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।

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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति