संत हृदय जस निर्मल बारी

चौपाई ४, दोहा ३९ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी॥ जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा॥ ४ ॥

अर्थ

उसका जल संतों के हृदय-जैसा निर्मल है। मन को हरनेवाले सुंदर चार घाट बाँधे हुए हैं। भाँति-भाँति के पशु जहाँ-तहाँ जल पी रहे हैं। मानो उदार दानी पुरुषों के घर याचकों की भीड़ लगी हो !

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।

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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति