बिकसे सरसिज नाना रंगा

चौपाई १, दोहा ४० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा॥ बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा॥ १ ॥

अर्थ

उसमें रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं। बहुत-से भौरे मधुर स्वर से गुंजार कर रहे हैं। जल के मुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं, मानो प्रभु को देखकर उनकी प्रशंसा कर रहे हों।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शबरी पर प्रभु की कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर प्रस्थान का वर्णन है।

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शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति