जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी
चौपाई २, दोहा २६९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥ जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥ २ ॥
अर्थ
परशुरामजी हित समझकर भी सहज ही जिसकी ओर देख लेते हैं, वह समझता है मानो मेरी आयु पूरी हो गयी। फिर जनकजी ने आकर सिर नवाया और सीताजी को बुलाकर प्रणाम कराया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जयमाल पहनाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में धनुषभंग के बाद सीता द्वारा श्रीराम को जयमाल अर्पण और देवताओं की पुष्पवर्षा का वर्णन है।
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जयमाल पहनाना