बलु प्रतापु बीरता बड़ाई
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई
चौपाई ४, दोहा २६६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥ सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥ ४ ॥
अर्थ
आह ! तुम्हारा बल, प्रताप, वीरता, बड़ाई और नाक (प्रतिष्ठा) तो धनुष के साथ ही चली गयी। वही वीरता थी कि अब कहीं से मिली है? ऐसी दुष्ट बुद्धि है, तभी तो विधाता ने तुम्हारे मुख पर कालिख लगा दी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जयमाल पहनाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में धनुषभंग के बाद सीता द्वारा श्रीराम को जयमाल अर्पण और देवताओं की पुष्पवर्षा का वर्णन है।
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जयमाल पहनाना