बृषभ कंध उर बाहु बिसाला

चौपाई ४, दोहा २६८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥ कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥ ४ ॥

अर्थ

बैल के समान ऊँचे और पुष्ट कंधे हैं; छाती और भुजाएँ विशाल हैं। सुन्दर यज्ञोपवीत धारण किये, माला पहने और मृगचर्म लिये हैं। कमर में मुनियों का वस्त्र और दो तरकस बाँधे हैं। हाथ में धनुष-बाण और सुन्दर कंधे पर फरसा धारण किये हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जयमाल पहनाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में धनुषभंग के बाद सीता द्वारा श्रीराम को जयमाल अर्पण और देवताओं की पुष्पवर्षा का वर्णन है।

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जयमाल पहनाना